शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2022

"वैश्विक महामारी और गाँव-शहर"


वैश्विक महामारी के इस दौर में भी गाँव अपनी रफ्तार पकड़े हुए है।खेत कट रहें हैं,गेहूँ की कटाई शुरू हो चुकी है,सरसों छत में कहीं पंखा लगाकर भूसे से अलग किया जा रहा है,राई साथ मे आराम कर रही है,अरहर बरोठे में
सेंकी जा रही है,आम की बौर से नवजात हुई अमियाँ किशोरावस्था में प्रवेश कर रही है,गाय रंभा रही है,पक्षी उसी तरह गीत गाने में व्यस्त है, कुत्ते पगडंडियों में स्वतंत्र विचरण कर रहे हैं,गाँव की अम्मा शाम को तालाब की मेड़ में चीटियों को दाना डालने जाती है।इन सब के बीच इन्हीं गाँव वालों की तस्वीरों ने शहर में बैठे लोंगो के लिए आशा की किरण की तरह काम किया है।

लोग निराश है?या अपने ही घरों में रहकर वो खुश हैं भी या नहीं कोई बता नहीं पा रहा है.सूरज पश्चिम की ओर छप्पर में जब डूबता हुआ दिखाई देता है उस वक्त मानो छप्पर समुद्र का क्षितिज बन जाता है और लगता है जैसे यहीं डूबने से ही सूर्य का अस्तित्व कल सुबह तक के लिए नहीं होता होगा। लोग घर पर हैं,शाम को छत पर निकलते हैं,नीले आकाश को देखकर विस्मय बोध सा होता है!और सहसा.. याद आता है कि कल किसी की स्टोरी पर यही शाम देखी थी.कितना अलग,कितना अद्भूत होता है खुली आँखों से इस नीले आकाश की ओर देखना..?

कुछ लोंगो ने खुलकर हँसना शुरू किया है,सुबह उठना शुरू किया है,इतने दिनों बाद ये दिनचर्या शांत होकर अपना कार्य शांति से कर रही है।कुछ को अब पता चला है कि,उनके घर के पीछे जो गेंदे के फूल उस ठंड में फूल रहे थे,उनके पौधे सूख गए हैं,और उसके नीचे जड़ो के आस पास निकल आए हैं कई और पौधे।पीपल और कदम्ब के पत्तो का पतझड़ अब शुरू हुआ है,नव किसलय इस महीने ही आएं हैं।प्याज के खेतों के बीच मेड़ो में जो बिना लगाई हुई मनमस्त चौराई आ गई है,उसे तोड़कर साग बनाई जा रही है।शहर का बाजार बंद होने के बाद भी गाँव में किसी चीज की कमी नहीं है।सीमित संसाधनों से भरी जिंदगी गाँव मे किस प्रकार अपना जीवन सीधा और सरल बना कर कितनी खूबसूरत हो जाती कुछ को अब पता चला है।

शहर में पढ़ रहे बच्चे घर लौटें हैं,दीवाली और होली पर महीनो का इंतजार करने के बाद 5 दिनों की छूट्टीयां कितनी जल्दी खत्म हो जाती रहीं,और इस सेमेस्टर छूट्टीयां गिनना ही छोड़ दिया है।बचपन और स्कूल के दिनों गर्मी की छुट्टियों का जीवन उन्हें दोबारा 3 वर्षों या 4 वर्षो के बाद नसीब हुआ है।


सब कुछ शांत सा हो गया है।शहरों में हर जगह ताले लगे हुए हैं,और इसी बीच कुछ तस्वीरों की कसमसाहट हर एक शहरी के मन में मसोसकर रह गई है।गाँव की ओर पलायन कर रहे मजदूरों को देखकर सहम जाने वाले लोग सरकारों को दोष देते हुए दिख रहे हैं।
                  पर उन्हें क्या पता कि जिस घर में तुमने जिंदगी बिताई है उसी घर में तुम्हें कुछ दिनों के लिए बंद कर देना कैदखाने सा हो गया है।उसी तरह,गाँव का अपना मकान,खेत,बाग,बगीचा छोड़कर आने वाला मजदूर रैन बसेरे में कितनी रातें काटेगा?उसकी रैन कैसे बीत जाएगी इस अंधेरे में?कुछ को यह भीड़ गवार लग रही है,कुछ को जहालत दिखाई दे रही है,किन्तु टेंट और रैन बसेरे और इस महामारी के बीच लोगों में अपनी असुरक्षा का भाव भी हैं जो उन्हें गाँव की ओर लेकर जा रहा है।

किन्तु वहीं सामाजिक दूरी बनाने के बहाने लोग अपने घरों से नजदीक हो गए हैं।कोई घर पर नए व्यंजन बनाने की सोच रहा है,कोई माँ की रेसिपी को इंस्टाग्राम से सभी मित्रों के बीच शेयर करने में लगा हुआ है।बाबा-दादी अपने नातियों के साथ खेलने में लगे हुए हैं।बचपन को पाने की लालसा उनमें कितनी प्रबल है ये तब दिखाई देती है जब घुटनों के दर्द को झेल रहे दादाजी नाती को पीठ पर बिठाकर छत के पूरे चक्कर लगा डालते हैं।माँ अपने बच्चे के पीछे बहुत दिनों के बाद ऐसे भागकर उसे खाना खिलाने का आनंद प्राप्त कर पाई होगी।

लोंगो के पास इस समस्या का समाधान नहीं हैं,जिसने जिंदगी को कैद कर दिया है।हाथों से खाना खाने को रोबोट से काटें चम्मच चलवा लेने वाली फेसबुकिया पीढ़ी आज छोटे से विषाणु के भय की वजह से घरों मे डरी हुई है।चाँद, मंगल तक पहुचने और ब्लैक होल को देख लेने तक के स्वप्न जैसे कार्य को जिस आधुनिकता ने बड़ी धूमधाम से कर दिखाया वही आज एक छोटे से विषाणु के कारण असमर्थ दिख रही है।

ये वक्त भले ही दूर कर देने का भाव लेकर आया हो,किन्तु वास्तविकता यह है की हर एक व्यक्ति पहली बार इस प्रकार संगठित हुआ है।किसी को भी अंदाजा नहीं है कि कब हम इस भीषण आपदा से निकल पाएँगे।किसी के पास इसका जवाब नहीं है कि कब इसका इलाज संभव हो पाएगा।परंतु इस दुनिया ने मानव जाति को सुरक्षित करने के लिए इतनी बड़ी शपथ शायद ही कभी ली होगी।सभी को एक संतोष है कि इस लड़ाई में हम अकेले नहीं है।हर कोई अपने अपने तरीकों से इस लड़ाई का हिस्सा है।सड़क पर सफाई कर्मचारी से लेकर डॉक्टरो,नर्सों और पुलिस के साथ-२ घर पर रहने वाले लोग भी इस लड़ाई का हिस्सा हैं।

कहते हैं कि "हारा वही,जो लड़ा नहीं".हौसला बनाए रखना और विश्वास की डोर को एक-दूसरे के साथ मजबूती से थामें रखना है।प्रकृति जरूर हमारी परीक्षा ले रही है,और चिढ़ा रही है।कुछ दिनों पहले दिखाई दिया सुपर मून यही कह रहा था कि देखो तुम आज असहाय पड़े हो,पर मैंने अपने नियम अभी तक नहीं बदले हैं।तुमने मेरी सूरत बदल देने की कोशिश हर समय की है,आज वो समय है जब मैं करवट ले रहीं हूँ और तुम्हें यह सबकुछ शांत होकर मूकदर्शक बने रहकर करना होगा।प्रकृति का यही नियम है,रूदन के पीछे अवश्य गायन छिपा हुआ होता है।जिस प्रकार बादल पहले रोता है,और पीछे इंद्रधनुषी रंग बिखेर देता है।इन दिनों के बनने में देर नहीं लगनी है।



@Prateekkumartiwari

गुरुवार, 24 जनवरी 2019

"बोलती कलम"

चाय की आखिरी घूंट जैसी हो तुम
जिसे न खत्म करना अच्छा लगता है ..न छोड़ना !!

यूं तो उस पेड़ को कटे जमाना हो गया
मगर ढूंढने अपना ठीकाना वो परिंदा रोज आता है !!

सोमवार, 1 अक्टूबर 2018

स्वच्छता अभियान

सुनो सभी ओ भारतवासी,
    मिली आजादी अच्छी खासी ।
मिल-जुल कर फिर हाथ जुटे सब,
    सुंदर स्वच्छ बने भारत तब ।।
   
     साबरमती के संत ने ,
आज फिर किया आव्हान है ।
 दीर्घ स्वप्नित लक्ष्य पर सबका यही अब गान है ।
"हौसलों से मुठ्ठियाँ भर ,
     जन चेतना से भींचकर"
हम साथ सबको ले चलें..
"स्वच्छ भारत" गान गाते संग सब चलते चलें।

गांव , कस्बा , गली सारी
साफ रखना ध्येय हो ।
यह अगर हम ठान लें तो
फिर किसे संदेह हो।
  जागरुकता मंत्र एक
आज लेकर हम चलें
"स्वच्छ भारत" गान गाते संग सब चलते चलें।

बच्चे ,बूढ़े और बहनें
सभी आए अब सभी
हाथ में यह कार्य लेकर
पूर्ण करलें व्रत अभी ।
  पूर्वजों के दिए व्रत से
सब पुनः से सबक लें
"स्वच्छ भारत" गान गाते संग सब चलते चलें ।

कूड़ेदान और शौचालय की
कीमत सबको समझानी है।
जैव अपशिष्ट प्रबंधन कर
अब जैविक खाद बनानी है।
ई-कचरे और कारख़ाने की
  बातें अभी अधूरी है।
पुनर्चलन, निदान यही दो बातें बड़ी जरूरी है ।
  "हो प्रदूषण मुक्त भारत"
गीत गुनगुनाते चलें।
"स्वच्छ भारत" गान गाते संग सब चलते चलें ।

आओ सब मिल हाथ बढ़ाए
और स्वच्छता हम अपनाएं
चेतनता के दिए जलाकर
स्वप्न को अब साकार बनाएं।
  
जन-जन का हो अब यह नारा
स्वच्छ भारत बनें हमारा
फैले हरियाली चंहु ओर
तभी बढ़ेगा " एक कदम स्वच्छता की ओर "
  स्वैच्छिक विचारों की श्रृंखला को
पूर्ण पोषित कर चलें
"स्वच्छ भारत" गान गाते संग सब चलतें चलें।

प्रतीक तिवारी

बुधवार, 6 जून 2018

वृक्ष "जीवन के आधार"

जब पुष्प लगे तो मधु को रस..
करते सबको निःस्वार्थ  प्रेम
फल लगते ही सबको देते ..
अधम भूख से शांति नेम।।

हर राहगीर का साथी बन..
देते है उसको शीतल छाँव
ह्रदयाशीष देकर इनको..
राही रखता है थके पांव।।

हर जाने वाले राही ने ..
नव युग की आवाजाही ने
उस भृमतित भटके माही ने 
हम सबकी लापरवाही ने।।

जो तोड़ा है बंधन हमसे 
इस वर्तमान की खाई ने
नित नेम ही वृक्ष लगाकरके
नव पल्लव से शोभित करके 
गुंजार इन्हें करना होगा 
तव ही सब रोग रहित होकर
सुंदर शोभित जीवन होगा ।।

"प्रतीक तिवारी "




शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018

"जीवन और संघर्ष"

संघर्षों से है यह जीवन,
       प्रतिपल यह संघर्ष है ।
दृढ़ ,निश्चय और धैर्य ,लगन से ,
       शीघ्र फलित उत्कर्ष है।

हर पल होता यहां परीक्षण,
        जीवन के उच्च विचारो से।
हटे नही जो , डटे रहे तुम,
        विजयी होगे मझधारो से ।

 दर्पित अरि जब रणभूमि में,
             गर तुमसे टकराएंगे ।
सलिल,अनीक,कृशानि,केशरी,
             नतमस्तक हो जाएंगे।

 गर भय हो जाए तम दर्पण से,
          लड़कर उसे मिटाओ तुम।
कर्म-शक्ति और विजय घोष कर ,
           सिंधु पार कर जाओ तुम।

 तरणि समान वेग सी शोभित,
           ज्ञान-ध्वजा लहरा देना।
जड़,अनुचर,और आत्मप्रवंचित
        को सम-जाह दिला देना ।

मातृभूमि औऱ माँ चरणों का ,
       कर्ज अदा जो कर पाए।
संघर्षित, अनवरित जीवन का,
     फल-उत्कर्ष ये मिल जाए।
                         
  "प्रतीक तिवारी"

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

"रंगों पर राजनीति"

उत्तरप्रदेश के बदायूं में जिस प्रकार बाबा साहेब की प्रतिमा पर भगवा रंग चढ़ाया गया ,इससे यह धीरे-धीरे स्पष्ट होता जा रहा कि यूपी में रंग की राजनीति सीएम हाउस के भगवामय होने से शुरू होकर प्रतिमाओ में आकर के उलझ गई है ।

         प्रशासन द्वारा प्रतिमा को ठीक कराने के उद्देश्य से प्रतिमा पर भगवा रंग की परत चढ़ा देने से यह स्पष्ट होता है कि सरकार या फिर कोई भी राजनीतिक दल जनता की सास्कृतिक भावनाओं को लक्ष्य बनाकर जनता  को इस ओर ध्यान आकर्षित करने की राजनीति कर रहे है ।
        कोई नीला,कोई भगवा,कोई लाल ,तरह -तरह के रंगों की राजनीति पर वोट बैंक का रंग चढ़ाने के लिए ये दल यह भूल जाते है कि हमने संविधान की शपथ लेकर समाज से इसी भेदभाव को मिटाने के लिए राजनीति में कदम रखा है । 
      सभी राजनीतिक दलों एवम पार्टियों को यह समझना होगा कि सांस्कृतिक भावनाओं से खिलवाड़ और  उनसे उनकी विरासत से छीनने का यह प्रयास धार्मिक उन्माद और साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देगा और लोंगों का लोकतंत्र में से भरोसा उठने में देर न लगेगी ।

"प्रतीक तिवारी"

बुधवार, 11 अप्रैल 2018

"हितैषी बनने की होड़"

" हितैषी बनने की होड़"

-"मैं हिन्दू हूं", "हम ईद नही मनाते", "मैं जनेऊधारी हिंदू हूं"।

तरह -तरह के विलाप करते हुए इन पंडितों और धर्मगुरुओं की हितैषी सभा ने शुभचिंतक दिखने की होड़ ने वर्तमान राजनीति की दिशा एवं दशा दोनों को धुंधले रास्ते मे लाकर रख दिया है ।

       इसी तर्ज में जारी है आजकल ज्यादा दलित हितैषी दिखने का क्रम। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जनजाति/अनु.जनजाति एक्ट पर कुछ प्रावधान किये गये ,और जारी हुआ हितैषी और शुभचिंतक दिखने का सिलसिला।

दलित  संगठनों ने जैसे ही भारत बंद का एलान किया ,कुछ घंटों बाद राजनीति दलों और फर्जी राष्ट्रवादियों एवं कतिथ कम्युनिस्टों का दलितों के प्रति दर्द फूट पड़ा।

और ट्वीट-ट्वीट के खेल खेलकर अपनी- अपनी उपस्थित दर्ज करा दी ।

        प्रायः देखने को आता है कि किसी आंदोलन या प्रदर्शन में हर एक दल अपनी रोटियां इन आंदोलनो पर सेंकने की कोशिश करता है,और आंदोलन की मूलभूत आवाज इस राजनीति बयानबाजी और शोरगुल के बीच दब कर रह जाती है ।
 
"प्रतीक तिवारी"