सोमवार, 1 अक्टूबर 2018

स्वच्छता अभियान

सुनो सभी ओ भारतवासी,
    मिली आजादी अच्छी खासी ।
मिल-जुल कर फिर हाथ जुटे सब,
    सुंदर स्वच्छ बने भारत तब ।।
   
     साबरमती के संत ने ,
आज फिर किया आव्हान है ।
 दीर्घ स्वप्नित लक्ष्य पर सबका यही अब गान है ।
"हौसलों से मुठ्ठियाँ भर ,
     जन चेतना से भींचकर"
हम साथ सबको ले चलें..
"स्वच्छ भारत" गान गाते संग सब चलते चलें।

गांव , कस्बा , गली सारी
साफ रखना ध्येय हो ।
यह अगर हम ठान लें तो
फिर किसे संदेह हो।
  जागरुकता मंत्र एक
आज लेकर हम चलें
"स्वच्छ भारत" गान गाते संग सब चलते चलें।

बच्चे ,बूढ़े और बहनें
सभी आए अब सभी
हाथ में यह कार्य लेकर
पूर्ण करलें व्रत अभी ।
  पूर्वजों के दिए व्रत से
सब पुनः से सबक लें
"स्वच्छ भारत" गान गाते संग सब चलते चलें ।

कूड़ेदान और शौचालय की
कीमत सबको समझानी है।
जैव अपशिष्ट प्रबंधन कर
अब जैविक खाद बनानी है।
ई-कचरे और कारख़ाने की
  बातें अभी अधूरी है।
पुनर्चलन, निदान यही दो बातें बड़ी जरूरी है ।
  "हो प्रदूषण मुक्त भारत"
गीत गुनगुनाते चलें।
"स्वच्छ भारत" गान गाते संग सब चलते चलें ।

आओ सब मिल हाथ बढ़ाए
और स्वच्छता हम अपनाएं
चेतनता के दिए जलाकर
स्वप्न को अब साकार बनाएं।
  
जन-जन का हो अब यह नारा
स्वच्छ भारत बनें हमारा
फैले हरियाली चंहु ओर
तभी बढ़ेगा " एक कदम स्वच्छता की ओर "
  स्वैच्छिक विचारों की श्रृंखला को
पूर्ण पोषित कर चलें
"स्वच्छ भारत" गान गाते संग सब चलतें चलें।

प्रतीक तिवारी

बुधवार, 6 जून 2018

वृक्ष "जीवन के आधार"

जब पुष्प लगे तो मधु को रस..
करते सबको निःस्वार्थ  प्रेम
फल लगते ही सबको देते ..
अधम भूख से शांति नेम।।

हर राहगीर का साथी बन..
देते है उसको शीतल छाँव
ह्रदयाशीष देकर इनको..
राही रखता है थके पांव।।

हर जाने वाले राही ने ..
नव युग की आवाजाही ने
उस भृमतित भटके माही ने 
हम सबकी लापरवाही ने।।

जो तोड़ा है बंधन हमसे 
इस वर्तमान की खाई ने
नित नेम ही वृक्ष लगाकरके
नव पल्लव से शोभित करके 
गुंजार इन्हें करना होगा 
तव ही सब रोग रहित होकर
सुंदर शोभित जीवन होगा ।।

"प्रतीक तिवारी "




शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018

"जीवन और संघर्ष"

संघर्षों से है यह जीवन,
       प्रतिपल यह संघर्ष है ।
दृढ़ ,निश्चय और धैर्य ,लगन से ,
       शीघ्र फलित उत्कर्ष है।

हर पल होता यहां परीक्षण,
        जीवन के उच्च विचारो से।
हटे नही जो , डटे रहे तुम,
        विजयी होगे मझधारो से ।

 दर्पित अरि जब रणभूमि में,
             गर तुमसे टकराएंगे ।
सलिल,अनीक,कृशानि,केशरी,
             नतमस्तक हो जाएंगे।

 गर भय हो जाए तम दर्पण से,
          लड़कर उसे मिटाओ तुम।
कर्म-शक्ति और विजय घोष कर ,
           सिंधु पार कर जाओ तुम।

 तरणि समान वेग सी शोभित,
           ज्ञान-ध्वजा लहरा देना।
जड़,अनुचर,और आत्मप्रवंचित
        को सम-जाह दिला देना ।

मातृभूमि औऱ माँ चरणों का ,
       कर्ज अदा जो कर पाए।
संघर्षित, अनवरित जीवन का,
     फल-उत्कर्ष ये मिल जाए।
                         
  "प्रतीक तिवारी"

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

"रंगों पर राजनीति"

उत्तरप्रदेश के बदायूं में जिस प्रकार बाबा साहेब की प्रतिमा पर भगवा रंग चढ़ाया गया ,इससे यह धीरे-धीरे स्पष्ट होता जा रहा कि यूपी में रंग की राजनीति सीएम हाउस के भगवामय होने से शुरू होकर प्रतिमाओ में आकर के उलझ गई है ।

         प्रशासन द्वारा प्रतिमा को ठीक कराने के उद्देश्य से प्रतिमा पर भगवा रंग की परत चढ़ा देने से यह स्पष्ट होता है कि सरकार या फिर कोई भी राजनीतिक दल जनता की सास्कृतिक भावनाओं को लक्ष्य बनाकर जनता  को इस ओर ध्यान आकर्षित करने की राजनीति कर रहे है ।
        कोई नीला,कोई भगवा,कोई लाल ,तरह -तरह के रंगों की राजनीति पर वोट बैंक का रंग चढ़ाने के लिए ये दल यह भूल जाते है कि हमने संविधान की शपथ लेकर समाज से इसी भेदभाव को मिटाने के लिए राजनीति में कदम रखा है । 
      सभी राजनीतिक दलों एवम पार्टियों को यह समझना होगा कि सांस्कृतिक भावनाओं से खिलवाड़ और  उनसे उनकी विरासत से छीनने का यह प्रयास धार्मिक उन्माद और साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देगा और लोंगों का लोकतंत्र में से भरोसा उठने में देर न लगेगी ।

"प्रतीक तिवारी"

बुधवार, 11 अप्रैल 2018

"हितैषी बनने की होड़"

" हितैषी बनने की होड़"

-"मैं हिन्दू हूं", "हम ईद नही मनाते", "मैं जनेऊधारी हिंदू हूं"।

तरह -तरह के विलाप करते हुए इन पंडितों और धर्मगुरुओं की हितैषी सभा ने शुभचिंतक दिखने की होड़ ने वर्तमान राजनीति की दिशा एवं दशा दोनों को धुंधले रास्ते मे लाकर रख दिया है ।

       इसी तर्ज में जारी है आजकल ज्यादा दलित हितैषी दिखने का क्रम। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जनजाति/अनु.जनजाति एक्ट पर कुछ प्रावधान किये गये ,और जारी हुआ हितैषी और शुभचिंतक दिखने का सिलसिला।

दलित  संगठनों ने जैसे ही भारत बंद का एलान किया ,कुछ घंटों बाद राजनीति दलों और फर्जी राष्ट्रवादियों एवं कतिथ कम्युनिस्टों का दलितों के प्रति दर्द फूट पड़ा।

और ट्वीट-ट्वीट के खेल खेलकर अपनी- अपनी उपस्थित दर्ज करा दी ।

        प्रायः देखने को आता है कि किसी आंदोलन या प्रदर्शन में हर एक दल अपनी रोटियां इन आंदोलनो पर सेंकने की कोशिश करता है,और आंदोलन की मूलभूत आवाज इस राजनीति बयानबाजी और शोरगुल के बीच दब कर रह जाती है ।
 
"प्रतीक तिवारी"