गुरुवार, 24 जनवरी 2019

"बोलती कलम"

चाय की आखिरी घूंट जैसी हो तुम
जिसे न खत्म करना अच्छा लगता है ..न छोड़ना !!

यूं तो उस पेड़ को कटे जमाना हो गया
मगर ढूंढने अपना ठीकाना वो परिंदा रोज आता है !!

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